गाय पालन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले घर को गौशाला कहते हैं। हिंदू धर्म में गाय को माता माना जाता है और उसकी हर तरह से सेवा और सुरक्षा करना पुण्य का काम माना जाता है। भारत में कई गौशालाएँ हैं, सरकार भी इन्हें चलाने के लिए पैसा देती है और गौ प्रेमी दान भी करते हैं, कुछ अमीर लोग भी गौशालाएँ चलाते हैं। गौशालाएँ ज़्यादातर भारत के गाँवों में पाई जाती हैं। आज भी भारत के गाँवों के लोग जब सुबह रोटी बनाते हैं, तो तवे से पहली रोटी गाय को खिलाते हैं, और फिर अपने बच्चों और परिवार को देते हैं।
हमारे देश की 70% से अधिक जनसंख्या गाय को पूजती है। यद्यपि देश की गौवंशीय जनसंख्या में देशी गौवंश का प्रभुत्व है, फिर भी संकर नस्ल के गौवंशीय पशुओं की जनसंख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे हमारे देशी गौवंशीय पशुओं की आनुवंशिक विविधता को खतरा है। देश में आवारा गौवंशीय पशुओं की बड़ी संख्या एक और समस्या है और उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। गौशालाएँ लगातार बढ़ती आवारा गौवंशीय जनसंख्या के प्रबंधन और हमारे बिगड़ते आनुवंशिक आधार के संरक्षण के लिए एक अच्छा विकल्प हैं।
हाल के वर्षों में आवारा पशुओं की समस्या ने चिंताजनक रूप धारण कर लिया है और राजनीतिक आयाम भी ग्रहण कर लिए हैं। देश में आवारा पशुओं की अनुमानित संख्या 45-55 लाख है। अवांछित नर और बांझ, वृद्ध और अशक्त मादा मवेशियों को, जिनकी किसानों के लिए कोई वैकल्पिक उपयोगिता नहीं है और जिनका कोई बाजार मूल्य नहीं है, उनके मालिक गुप्त रूप से छोड़ देते हैं। अवैध व्यापार पर शिकंजा कसने और अनधिकृत बूचड़खानों के बंद होने से, खासकर उत्तरी और मध्य भारतीय राज्यों में,यह समस्या और भी बदतर हो गई है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला सुनाया कि यह समस्या संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त शहरवासियों के जीने के अधिकार का उल्लंघन है। इन जीवों के निपटान की कोई उचित व्यवस्था न होने के कारण, धार्मिक दान-संस्थाएँ आगे आईं और गौ-रक्षा आश्रयों की स्थापना की — जिन्हें आज हम गौशालाएँ कहते हैं।
कई गौशालाओं ने अपना उद्देश्य काफी अच्छी तरह पूरा किया और कुछ का आकार बढ़ा, विविधता आई और वे अपने आप में एक संस्था बन गईं। कुछ को स्थानीय समुदायों का समर्थन मिला; जबकि कई अन्य सीमित संसाधनों के कारण हाशिए पर ही रहीं। हाल के दिनों में, आवारा पशुओं की भारी आमद के कारण, इनमें से अधिकांश गौशालाएँ भीड़भाड़ वाली हो गई हैं और इन पशुओं के उचित रखरखाव और भरण-पोषण के लिए पर्याप्त स्थान, धन, मानव संसाधन और अन्य सुविधाओं/संसाधनों का अभाव है।
गाय पालन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले घर को गौशाला कहते हैं। हिंदू धर्म में गाय को माता माना जाता है और उसकी हर तरह से सेवा और सुरक्षा करना पुण्य का काम माना जाता है। भारत में कई गौशालाएँ हैं, सरकार भी इन्हें चलाने के लिए पैसा देती है और गौ प्रेमी दान भी करते हैं, कुछ अमीर लोग भी गौशालाएँ चलाते हैं। गौशालाएँ ज़्यादातर भारत के गाँवों में पाई जाती हैं। आज भी भारत के गाँवों के लोग जब सुबह रोटी बनाते हैं, तो तवे से पहली रोटी गाय को खिलाते हैं, और फिर अपने बच्चों और परिवार को देते हैं।
आज विश्व में बिगड़ते पर्यावरण के कारण गिरता जलवायु का स्तर एक चिंता का विषय बन गया है आज दिल्ली जैसे शहर की खुली हवा में साँस लेना मुश्किल हो गया है | समय रहते अगर इस समस्या के समाधान पर ध्यान ना दिया गया तो स्थिति इतनी विष्फोटक हो सकती है जिसकी हम कल्पना भी नही कर सकते | देश में पर्यावरण सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय पर्यावरण सुरक्षा परियोजना के अंतर्गत CRASMIB गौशाला/पर्यावरण सुरक्षा बोर्ड सम्पूर्ण भारत में खाली पड़ी बेकार भूमी पर आर्टिजन एग्रो इन्डिया प्राइवेट लिमिटेड तथा समाजसेवी संस्थाओं के सहयोग से राज्य के सभी स्कूलों में पर्यावरण बचेगा,मानव बचेगा जागरूकता मिशन चलाना चाहती है तथा जन सहयोग से हर गौशाला की खाली पड़ी भूमी पर 10000 बांस पौधों का एक “गौस्मृति वन आक्सीजन पार्क” बनाना चाहती है| जिससे गौशालाओं की आमदनी बढ़ने के साथ गौवंस को सुध वातावरण मिलेगा तथा लाखों गौशालाओ का होगा विकास भक्तों को मिलेगा सुंदर वातावरण लाखों युवाओं को मिलेगा रोजगार जो देश के विकास में दे सकते हैं योगदान..
**प्राचीन ग्रंथों में सुरभि (इंद्र के पास), कामधेनु (समुद्र मंथन के 14 रत्नों में एक),पदमा,कपिला आदि गायों का महत्व बताया है। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देवजी ने असि, मसि व कृषि गौ वंश को साथ लेकर मनुष्य को सिखाए। कि हमारा पूरा जीवन गाय पर आधारित है।
** जब हम किसी अत्यंत अनिवार्य कार्य से बाहर जा रहे हों सामने गाय माता के इस प्रकार दर्शन हो जब वह अपने बछड़े या बछिया को दूध पिला रही हो तो समझ जाना चाहिए की जिस काम के लिए हम निकले हैं वह कार्य अब निश्चित ही पूर्ण होगा।
** शिव मंदिर में काली गाय के दर्शन मात्र से काल सर्प योग निवारण हो जाता है।गाय के पीछे के पैरों के खुरों के दर्शन करने मात्र से कभी अकाल मृत्यु नहीं होती है।
** गाय की प्रदक्षिणा करने से चारों धाम के दर्शन लाभ प्राप्त होता है,क्योंकि गाय के पैरों में चारो धाम है।
**आज भी कई घरों में गाय की पहली रोटी निकाली जाती है। कई स्थानों पर संस्थाएं गौशाला बनाकर पुनीत कार्य कर रही है,जो कि प्रशंसनीय कार्य है।
** जिस प्रकार पीपल का वृक्ष एवं तुलसी का पौधा आक्सीजन छोड़ते है। एक छोटा चम्मच देसी गाय का घी जलते हुए कंडे पर डाला जाए तो एक टन ऑक्सीजन बनती है। इसलिए हमारे यहां यज्ञ हवन अग्नि -होम में गाय का ही घी उपयोग में लिया जाता है। प्रदूषण को दूर करने का इससे अच्छा और कोई साधन नहीं है।
**धार्मिक ग्रंथों में लिखा है “गावो विश्वस्य मातर:” अर्थात गाय विश्व की माता है। गौ माता की रीढ़ की हड्डी में सूर्य नाड़ी एवं केतुनाड़ी साथ हुआ करती है, गौमाता जब धुप में निकलती है तो सूर्य का प्रकाश गौमाता की रीढ़ हड्डी पर पड़ने से घर्षण द्धारा केरोटिन नाम का पदार्थ बनता है जिसे स्वर्णक्षार कहते हैं। यह पदार्थ नीचे आकर दूध में मिलकर उसे हल्का पीला बनाता है। इसी कारण गाय का दूध हल्का पीला नजर आता है। इसे पीने से बुद्धि का तीव्र विकास होता है।
** जब हम किसी अत्यंत अनिवार्य कार्य से बाहर जा रहे हों सामने गाय माता के इस प्रकार दर्शन हो जब वह अपने बछड़े या बछिया को दूध पिला रही हो तो समझ जाना चाहिए की जिस काम के लिए हम निकले हैं वह कार्य अब निश्चित ही पूर्ण होगा।
**गौ माता का जंगल से घर वापस लौटने का संध्या का समय (गोधूलि वेला) अत्यंत शुभ एवं पवित्र है। गाय का मूत्र गो औषधि है। मां शब्द की उत्पत्ति गौ मुख से हुई है। मानव समाज में भी मां शब्द कहना गाय से सीखा है। जब गौ वत्स रंभाता है तो मां शब्द गुंजायमान होता है।
** गौ-शाला में बैठकर किए गए यज्ञ हवन ,जप-तप का फल कई गुना मिलता है। बच्चों को नजर लग जाने पर, गौ माता की पूंछ से बच्चों को झाड़े जाने से नजर उत्तर जाती है, इसका उदाहरण ग्रंथों में भी पढ़ने को मिलता है, जब पूतना उद्धार में भगवान कृष्ण को नजर लग जाने पर गाय की पूंछ से नजर उतारी गई।
**गौ के गोबर से लीपने पर स्थान पवित्र होता है।गौ-मूत्र का पवन ग्रंथों में अथर्ववेद, चरकसहिंता, राजतिपटु, बाण भट्ट, अमृत सागर, भाव सागर, सश्रुतु संहिता में सुंदर वर्णन किया गया है।
**काली गाय का दूध त्रिदोष नाशक सर्वोत्तम है। रुसी वैज्ञानिक शिरोविच ने कहा था कि गाय का दूध में रेडियो विकिरण से रक्षा करने की सर्वाधिक शक्ति होती है। गाय का दूध एक ऐसा भोजन है, जिसमें प्रोटीन कार्बोहाइड्रेड, दुग्ध, शर्करा, खनिज लवण वसा आदि मनुष्य शरीर के पोषक तत्व भरपूर पाए जाते है। गाय का दूध रसायन का करता है।
**आज भी कई घरों में गाय की पहली रोटी निकाली जाती है। कई स्थानों पर संस्थाएं गौशाला बनाकर पुनीत कार्य कर रही है, जो कि प्रशंसनीय कार्य है। साथ ही यांत्रिक कत्लखानों को बंद करने का आंदोलन, मांस निर्यात नीति का पुरजोर विरोध एवं गौ रक्षा पालन संवर्धन हेतु सामाजिक धार्मिक संस्थाएं एवं सेवा भावी लोग लगातार संघर्षरत है।
दुःख इस बात का भी होता है कि लोग गाय को आवारा भटकने के लिए बाजारों में छोड़ देते है। उन्हें इनके भूख प्यास की कोई चिंता ही नहीं होती। लोगों को चाहिए की यदि गाय पालने का शौक है तो उनकी देखभाल भी आवश्यक है, क्योंकि गाय हमारी माता है गौ रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।
मित्रों हमारा भारत कृषि प्रधान देश है 70% लोग गाँव मे ही रहते हैं किसी किसान के पास 5-10 एकड़ से भी कम जमीन है ऐसे किसानों की संख्या 50% से अधिक है जो आर्थिक रूप से बहुत ही पिछड़े हुए है, पूरा परिवार रात दिन मेहनत करने के बाद भी कर्जदार ही रहता है क्योंकि वह आधुनिक कृषि यन्त्र तथा तकनीकी जानकारी नही जुटा पाता है इसका उपाय केवल सामूहिक खेती से ही सम्भव हो सकता है,
जैसे कि सफेद क्रांति सामूहिक डेयरी व्यवसाय,
गाँव में हर परिवार के पास 2-3 दुधारू पशु अवश्य ही होते हैं, पूरा परिवार उनकी सेवा में लगा रहता है जिससे खर्चा ज्यादा होता है आमदनी कम ही होती है पशुओं को घर पर ही रखने से वातावरण में गन्दगी रहती है जिससे बीमारी भी ज्यादा ही होती है सामुहिक गौशाला में रखरखाव का खर्चा कम होता है तथा बीमारी भी कम ही होती है दूधारू पशु दूध ज्यादा देते हैं जिससे किसानों की आमदनी में बढ़त हो सकती है इसके लिए कुछ महिलाओ को मानदेय पर नियुक्त किया जा सकता है पशुशाला की स्थापना का कार्य मनरेगा के अंतर्गत कराया जा सकता है
गरीब परिवारों को (CRASMIB-Trust) तथा जन सहयोग से रोजगार मिल सकता है
पंचायत के 50 गरीब परिवार आपस में मिलकर दो दूधारू गाय तथा दो देशी गाय एक जगह रखें तो 200 गाय की एक गौशाला बन सकती है तथा 200 महिलाओं को स्वरोजगार मिल सकता है
1-गोबर उत्पाद यूनिट -------> 10 महिलाएं कार्यरत
2-गौमूत्र उत्पाद यूनिट -------> 5 महिलाएं कार्यरत
3-दूध उत्पादन यूनिट -------> 5 महिलाएं कार्यरत
4-गौ का घी उत्पादन यूनिट -------> 5 महिलाएं कार्यरत
5-दही हांडी उत्पादन यूनिट -------> 5 महिलाएं कार्यरत
6-गाय के लिए चारा यूनिट -------> 5 महिलाएं कार्यरत
7-गाय को नहलाना यूनिट -------> 5 महिलाएं कार्यरत
8-हिसाब रखरखाव यूनिट -------> 5 महिलाएं कार्यरत
इस प्रकार स्वसहायता समूह की 50 तथा पंचायत की 200 महिलाओं को स्वरोजगार मिल सकता है
आपका छोटा सा सहयोग गाय का जीवन बचा सकता है,,,
आओ गौ सेवा अपनाएं !
स्थाई रोजगार पाएं !
इस परियोजना से गौशालाओ का होगा विकास भक्तों को मिलेगा सुंदर वातावरण लाखों युवाओं को मिलेगा रोजगार जो देश के विकास में योगदान दे सकते हैं…
गौमाता संरक्षण के लिए बांस का एक पेड़
गौ स्मृति वन ऑक्सीजन पार्क में लगायें
नियमित मूल्य रु.295/-
2 से 3 फीट का पौधा +4 साल की देखभाल+नाम-टैग सहित
आज आप कितने पेड़ लगाएँगे?
इच्छानुसार पेड़ों की संख्या चुनें:- 5, 10, 25, 50 या 100 💡सुझाव:- अपने जीवनसाथी के 25वें जन्मदिन पर 25 पेड़ अपने जीवनसाथी के 50वें जन्मदिन पर 50 पेड़ लगवाएं,, आपके सहयोग से हर पेड़ एक किसान को लाभ देता है और इस धरती माता को स्वस्थ बनाता है। जन्मदिन समारोह के लिए इच्छानुसार पेड़ों की संख्या बढ़ा सकते हैं, इस पर आप पर्यावरण सुरक्षा पुरस्कार प्राप्त करें,साथ ही आपको इस पर्यावरण सुरक्षा के लिए 20 साल तक प्रति बांस पौधे100/- का सालाना एक गौ उत्पाद उपहार में मिलेगा ।